जरूरत है…’धाकड़’ बाप-बेटियों की

गोल्ड तो गोल्ड होता है, फिर चाहे वो लड़का लेकर आए या लड़की. यानि अगर लड़कियों को आप कमजोर, बोझ या नाकाबिल समझ रहे हैं तो कमियां लड़कियों में नहीं, आपकी सोच और परवरिश में है. देश के हर ‘बापू’ के लिए ‘दंगल के बापू’ का संदेश.

हालांकि शुरुआत में ही साफ कर दूं कि बाहुबल के महिमामंडन की पक्षधर मैं कभी नहीं रही. बाहुबल का महिमामंडन ठीक वैसा ही है जैसे आप एक ऐसे समाज के निर्माण का समर्थन कर रहे हों, जो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के मुहावरे पर काम करता हो. ये वैसा ही है कि एक गवइये को राजा बना दिया जाए और वो अपनी प्रजा की काबिलियत गीत गाने की प्रतिभा के हिसाब से तय करने लगे. जो गाए वो लायक, जो ना गाए वो नालायक, सीधी सी बात है कि प्रकृति ने इंसान के भीतर कई गुण दिए हैं और उन्हीं गुणों में से एक है बाहुबल. इसका महत्व उतना ही है जितना कि बाकी गुणों जैसे बुद्धि, चतुराई, संवेदना, ममता आदि का है. इसलिए सबसे पहले इस बात को नकारना होगा कि बाहुबल पर आधारित पितृसत्ता ही सच्चाई है या यही सर्वथा और अनंत है. अभी जो है, वो हमेशा था ऐसा नहीं है… और हमेशा रहेगा, यह भी तय नहीं है.

अब आते हैं उस समस्या पर जिसका ताल्लुक इस देश के हर राज्य, हर ज़िले, हर शहर, हर गांव, हर परिवार, हर पड़ोस, हर मर्द और हर औरत से है. ये समस्या है वो स्टीरियोटाइप जिसकी आड़ में हमारे समाज ने खांचे बनाए हैं. लड़कों के लिए अलग और लड़कियों के लिए अलग खांचा. उन्हीं खांचों में ढ़ालकर सदियों से चली आ रही असमानता को बड़ी धूर्तता से प्रकृति के नियम का नाम दे दिया जाता है और विरोध करने पर आप असामाजिक और ख़राब करार दे दिए जाते हैं लेकिन फिर भी विरोध होता है और होता रहेगा. विरोध की वजहें, उसका तरीका अलग-अलग हो सकता है लेकिन इतना तय है कि हर विरोध कम से कम एक खांचे को तोड़ता है, और समाज को एक कदम आगे, एक छटांक बेहतर की ओर ले जाता है.

दंगल के ‘बापू’ यानि महावीर सिंह फोगाट के पास विरोध की अपनी वजहें थीं. वो पहलवान जो गोल्ड मेडल लाने का अपना सपना पूरा करने के लिए बेटे की चाहत में उतावला था और बेटा नहीं होने पर बेटियों से पहलवानी कराने की ठानी. ये भले ही उसका जुनून हो लेकिन जिस सामाजिक परिवेश में उसने बेटियों को आगे बढ़ाने का फैसला किया उसके लिए सिर्फ जुनूनी दिमाग नहीं बल्कि वो तर्कसंगत सोच भी चाहिए जिसके दम पर आप समाज के सही और गलत को नसीब मानने की बजाए उसे ठेंगा दिखाने का हौसला रख सकें, जहां लड़कियों को सिर्फ चूल्हा-चौकी लायक समझा जाता हो, उन्हें बचपन से ही सजने-संवरने की ट्रेनिंग देकर शादी के सपने दिखाए जाते हों वहां जब लड़कियां हाफ पैंट पहनकर लड़कों के साथ कुश्ती लड़ने जाने लगें तो समाज की क्रूर प्रतिक्रिया का सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. उसे झेलकर, उससे निपटकर और उसे मुंहतोड़ जवाब देकर आगे बढ़ने वाले महावीर फोगाट जैसे पिताओं और गीता-बबीता जैसी बेटियों की जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम है. अगर इसे कांटों पर चलकर ताज हासिल करने की मिसाल दी जाए तो गलत नहीं होगा और मैं ये बात आत्मविश्वास के साथ इसलिए भी कह सकती हूं क्योंकि लडकियों के प्रति सोच और रवैये को लेकर फिलहाल इस देश का कोई भी राज्य अपवाद नहीं है. हरियाणा की तरह यूपी-बिहार तो इस तरह की पिछड़ी सोच के गढ़ हैं.

यहां ये समझना भी ज़रूरी है कि स्टीरियोटाइप की शुरूआत हमारे भीतर से होती है. कई बार ये उस इंसान के भीतर उतनी ही गहराई से बैठ जाता है जो खुद ही इसका शिकार भी हो. फिल्म में बड़ी ही सहजता से दिखाया गया है कि कैसे छोटी सी लड़की के ज़हन पर अपने परिवेश का इतना गहरा असर होता है कि उसे भारी विश्वास हो जाता है कि पहलवानी जैसे काम लड़कियों के लिए नहीं हैं, श्रृंगार करना लड़की होने की निशानी है, सलवार-कमीज ही लड़कियों का पहनावा है वगैरह वगैरह. ये बहुत छोटी-छोटी बाते हैं जो अगर अपनी मर्जी से की जाएं तो कोई मायने नहीं रखतीं लेकिन अगर यही करना किसी की नियति बना दी जाए तो पैरों की बेड़ियों सरीखी हो जाती हैं.

और अब सबसे ज़रूरी बात, जिसका सीधा संबंध उस सोच से है जिसे प्रकृति का नियम कहकर सदियों से असमानता का आधार बनाया जाता रहा है. स्त्री और पुरूष के बीच में बाहुबल का प्राकृतिक अंतर क्या इतना बड़ा था, जितना इसे बना दिया गया. इस अंतर को खाई बनाने में सामाजिक संरचना और परवरिश का कितना बड़ा हाथ है, ये फिल्म में बखूबी दिखाया गया. ऐसी ही और घटनाओं को अगर हम बारीकी से देखें तो ये बात और पुख्ता होती है कि लड़की को दकियानूसी सोच के दायरे में बड़ा करना, उसे कमज़ोर बनाना, उसके मष्तिस्क को कमतरी के भाव से भरना, स्त्री-पुरूष के बीच कृत्रिम रूप से ऐसा भेद पैदा कर देता है कि लोग इसी भेद को सच मानने लगते हैं. बारीकी से देखें तो पाएंगे कि ये सच नहीं बल्कि गढ़ा हुआ भ्रम है, भेदभाव पर आधारित व्यवस्था है. आपने खबर सुनी होगी कि कैसे सीरिया में आईएस के आतंकियों से कुर्दिश फीमेल फाइटर्स जमकर मुकाबला कर रही हैं. हाथ में हथियार लेकर महिलाओं पर हुए अत्याचार का बदला ले रही हैं और आईएस के पैर उखाड़ने के लिए बाकायदा ट्रेनिंग भी ले रही हैं. ये ताज़ा उदाहरण है लेकिन इतिहास में न जाने ऐसी कितनी घटनाएं मिलती हैं जहां महिलाओं ने युद्धकला में महारथ हासिल की है, हर भ्रम, हर स्टीरीयोटाइप को तोड़ा है.

आमिर ख़ान और उनकी टीम को ‘दंगल’ बनाने के लिए बधाई…. सच तो ये है कि हर लड़की जो परंपरागत सोच से विपरीत जाकर अपने लिए नई राह बनाने की जुगत में है वो हर कदम पर एक दंगल लड़ रही है. हर वो मां-बाप जो अपनी बेटी को बेटों से कम नहीं समझते और सामाजिक बंधनों पर नहीं बल्कि बेटी की प्रतिभा पर भरोसा करते हैं, वो एक दंगल लड़ रहे हैं. ये दंगल चलता रहेगा, अभी कईयों को चित्त करना बाकी है, कई खांचों को नेस्तनाबूत करना है. कई बेड़ियां तोड़ फेंकनी हैं, हमें याद रखना होगा कि विरोध की हर एक आवाज़, हर एक प्रयास, चाहे वो छोटा हो या बड़ा, इस दंगल को धार दे रहा है. कभी घर के भीतर, कभी दफ्तर के अंदर, कभी सड़कों पर तो कभी खेल के मैदान में, जीतना है तो दांव लगाने ही पड़ेंगे.

loading...