क्या ‘अपनों’ की नाराजगी के कारण कैराना उपचुनाव हार गई बीजेपी?

नई दिल्ली ;

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी को गुरुवार को करारा झटका देते हुए विपक्षी पार्टियों ने लोकसभा और विधानसभा की 14 सीटों के उपचुनावों में 11 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि भगवा पार्टी तथा उसके सहयोगियों को केवल तीन सीटों तक ही सीमित कर दिया. विपक्षी एकजुटता के कारण बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की चर्चित कैराना लोकसभा सीट को भी गंवा दिया. अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर इन उपचुनावों को प्रतिष्ठा की नजर से देखा जा रहा है. कैराना सीट पर मिली हार से बीजेपी को जबर्दस्त झटका लगा है. कैराना लोकसभा उपचुनाव में रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को 44618 मतों से हराया. तबस्सुम को 481182 और मृगांका को 436564 वोट मिले.

कैराना में जिस तरह से गठबंधन की ताकत दिखाई दी है, उसे देखकर बीजेपी कैंप में खलबली मची हुई है. भाजपा ने भी कैराना लोकसभा सीट को प्रतिष्ठा से जोड़कर रखा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा क्षेत्र में चुनावी जनसभाएं कीं, तो भाजपा के कई मंत्री, सांसद, विधायकों के अलावा आरएसएस की टीमें भी चुनाव प्रचार में लगाई गई थीं. मगर कुछ भी काम न आया. गन्ना किसानों के बकाये को हार की प्रमुख वजह बताया जा रहा है. खबरों के मुताबिक, करीब 12748 करोड़ रुपये गन्ना किसानों का बकाया है. गन्ना मंत्री सुरेश राणा, संगठन महामंत्री सुनील बंसल डेरा डाले हुए थे. इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या आंतरिक गुटबाजी के कारण कैराना में बीजेपी को हार मिली है?

बीजेपी के स्थानीय नेताओं में आपसी मतभेद को भी हार की बड़ी वजह माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, अपने ही योगी सरकार से नाराज थे और नहीं चाहते थे कि बीजेपी चुनाव जीते. शामली से विधायक व योगी सरकार में मंत्री सुरेश राणा, जाट नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान और बागपत से सांसद सतपाल सिंह के बीच कोई समन्यवय नजर नहीं आया. ये तीनों नेता यहां एक दूसरे के खिलाफ काम करते नजर आए. वहीं इसके उलट, विपक्ष के नेता एक साथ थे. उनकी एकता काम आई.

गोरखपुर और फूलपुर सीट में मिली हार के बाद योगी आदित्यनाथ इस बार काफी सतर्क थे. उन्हें अपने कई मंत्रियों को यहां पर जिम्मेदारियां दे रखी थीं लेकिन सरकार और संगठन के बीच मतभेद साफ तौर पर दिखे. सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर संगठन के लोग नाराज थे और वोट के लिए नहीं निकले. वहीं, सरकार का कहना है कि संगठन सरकार की कार्यप्रणाली में बाधा पहुंचा रहा है.

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