जिंदगी और मौत की जंग पहले भी जीत चुके हैं थाईलैंड की गुफा में फंसे खिलाड़ी

नई दिल्ली ;

थाईलैंड की लुआंग गुफा में 17 दिन कैद रहने वाले फुटबॉल खिलाड़ियों में शामिल अब्दुल सैमॉन के लिए जिंदगी और मौत की जंग नई नहीं है. छह साल की उम्र में अब्दुल से उनका घर ही नहीं, उनका देश भी छिन गया. म्यांमार में गुरिल्ला गृहयुद्ध के दौरान जान बचाने के लिए उन्हें अपना देश छोड़कर भागना पड़ा.

अब्दुल के माता पिता अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए उन्हें थाईलैंड ले आए. हालांकि उन्हें नहीं पता था कि उनके जीवन में संघर्ष का असली रोमांच मंगलवार को उस समय आएगा जब उन्हें और उनकी फुटबॉल टीम के 11 अन्य सदस्यों को उनके कोच के साथ बचा लिया गया.

करीब दस दिन तक अब्दुल और ‘वाइल्ड बोर्स’ फुटबाल टीम के उसके साथी गहरी गुफा की अनजान जगह पर रोशनी, पानी और भोजन के बिना फंसे रहे. एक ब्रिटिश गोताखोर ने 2 जुलाई को उन्हें खोजा. इस बचाव अभियान में अब्दुल की महत्वपूर्ण भूमिका रही और उन्होंने ब्रिटिश गोताखोर के साथ दुभाषिए की भूमिका निभाई. अंग्रेजी, थाई, बर्मी और मंदारिन बोलने में सक्षम अब्दुल ने ब्रिटिश गोताखोर से बातचीत में उन्होंने बताया कि उन लोगों को तत्काल भोजन की जरूरत है.

जब अब्दुल अपने घर आए तो कहने की जरूरत नहीं कि वहां जश्न का माहौल था. तीन दिन के बचाव अभियान में दर्जनों गोताखोरों, डॉक्टरों और सपोर्ट स्टाफ की टीम ने अब्दुल और उनके 12 साथियों को सुरक्षित निकाल लिया गया. अब्दुल पढ़ाई में बहुत तेज हैं और अपनी क्लास में हमेशा टॉप करते हैं. उनके बेहतर एकेडमिक रिकॉर्ड और खेलकूद के चलते उन्हें फ्री ट्यूशन और प्रतिदिन लंच की सुविधा मिली हुई है. अब्दुल के प्रिसिंपल भी कहते हैं कि ‘अब्दुल अच्छों में सबसे अच्छा है.’ इस स्कूल में करीब 20 प्रतिशत स्टूडेंट स्टेटलेस हैं और करीब आधे स्टूडेंट नस्लीय अल्पसंख्यक समुदाय से हैं.

गुफा में फंसे तीन खिलाड़ी और उनके कोच स्टेटलेस नस्लीय अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. यानी उनका अपना कोई देश नहीं. वो म्यांमार से यहां आए हैं. इस अभियान से थाईलैंड की सेना को अपनी छवि बेहतर बनाने में मदद मिली है. आम लोगों का मानना है कि अभियान की कामयाबी का श्रेय सेना को जाता है. थाई नेवी सील ने इस बचाव अभियान की अगुवाई की और उसके एक सेवानिवृत्त गोताखोर की इस अभियान के दौरान मृत्यु हो गई.

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