पठानकोट हमले से हमने कुछ सीखा की नहीं

विपिन गौड़

पठानकोट हमले के बाद भारतीय एजेंसियों को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं लगी कि आतंकवादी पाकिस्तान से आए और इस कार्रवाई की साजिश वहीं रची गई. जल्द ही इस बारे में ‘कार्रवाई-योग्य खुफिया सूचना’ पाकिस्तान को मुहैया करा दी गई, लेकिन अब शक गहरा रहा है कि पुराने ढर्रे पर चलते हुए पाकिस्तान फिर टालमटोल में जुटा है. सोचना यह भी है, कि क्या हम इन हमलों से कोई सबक लेते हैं कि नहीं. या हर बार ऐसे ही चलता रहेगा लोग ऐसे ही मरते ही रहेंगे. दिखावटी तौर पर कुछ जगहों पर छापा मारने और कुछ लोगों को हिरासत में लेने की बात जरूर प्रचारित की गई है, लेकिन खबर है, कि उस फोन नंबर के पाकिस्तानी होने की बात पाक सरकार ने सिरे से नकार दी है, जिस पर पठानकोट आकर दहशतगर्दों ने बातचीत की थी. दरअसल, पिछले हफ्ते ही जब पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लगातार दो दिन आला अधिकारियों की बैठक की, तो उसके बाद पाकिस्तानी मीडिया में सरकारी सूत्रों के हवाले से यह खबर छपी थी कि भारत ने कोई ठोस सबूत नहीं दिए हैं.

संभवतः पाकिस्तानी रवैये से भारत में बढ़ती बेसब्री का ही नतीजा है, कि पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बयान दिया कि पाकिस्तान के ठोस कार्रवाई करने के बाद ही दोनों देशों के विदेश सचिवों की वार्ता होगी. (यह बातचीत 15 जनवरी को होनी तय है.) उसके बाद रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने कहा कि भारत को दर्द देने वालों को उसी अनुपात में चोट पहुंचाई जाएगी. ऐसा कब और कहां किया जाए, यह भारत तय करेगा. इस पृष्ठभूमि में गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह वक्तव्य विसंगति लगता है, कि पाकिस्तान ने प्रभावी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है और उस पर अविश्वास करने की कोई वजह नहीं है. सवाल है कि जिस फोन नंबर पर आतंकवादियों द्वारा कॉल करने के रिकॉर्ड भारत के पास हैं, उन्हें पाकिस्तान नहीं मानता तो फिर वह क्या कदम उठाएगा? अंतरराष्ट्रीय अपराधों- खासकर आतंकवाद जैसे मामलों- में कार्रवाइयां सुराग और संकेतों के आधार पर ही करनी होती हैं.

इनमें ठोस सबूत की मांग असल में कुछ न करने का बहाना होता है, जैसाकि 26/11 के समय देखा गया था. ऐसे ही अनुभवों के कारण अब भारतीय जनमत झांसे में आने को तैयार नहीं है. यानी परस्पर विरोधी सूचनाएं फैलाने के पाकिस्तानी तौर-तरीके इस बार कारगर नहीं हुए हैं. यही वजह है कि गुजरे एक हफ्ते में पाकिस्तान से समग्र वार्ता के प्रति भारत में जन-समर्थन लगातार क्षीण हुआ है. नतीजतन, पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए कृत-संकल्प एनडीए सरकार की दुविधा बढ़ी हंै.

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