पांच भारतीय जिन्होंने बदल कर रख दी वुमेन एम्पावरमेंट की परिभाषा

हमारे लिए महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाएं परिवार और समाज के सभी ‘बंधनों’ से मुक्त होकर अपने सभी निर्णय खुद लें. आज हम आपको ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो समाज और रिवाज़ों के विपरीत चलीं और सभी के लिए एक मिसाल बन गईं. इन महिलाओं ने महिला सशक्तिकरण की एक अलग परिभाषा गढ़ी.

छवि राजावत,  
छवि राजावत ने अपनी शुरुआती पढ़ाई आंध्र प्रदेश में की. उसके बाद उन्होंने राजस्थान और दिल्ली में अपनी आगे की पढ़ाई की. पूना से एमबीए करने वाली छवि ने कई बड़े ब्रांड्स के साथ काम किया. मगर जिस कारण से छवि देश भर में छा गईं वो था उनका एक छोटे से गांव का सरपंच बनने का फैसला. जी हां, छवि राजस्थान के टोंक जिले के सोडा गांव की सरपंच हैं. छवि ने गांव के लोगों को आगे बढ़ाने के लिए अपने अच्छे खासे कॉर्पोरेट करियर को छोड़ दिया. इतना ही नहीं वे संयुक्त राष्ट्र में भी अपने गांव का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.

नीलिमा मिश्रा,
मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित नीलिमा मिश्रा 13 साल की उम्र से महिलाओं, बच्चों और किसानों की परेशानियों को समझने लगी थीं. पुणे विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री लेने के बाद वह आराम से अच्छी नौकरी कर कर सकती थीं. मगर उन्होंने इसके उलट राह चुनी. नीलिमा ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला बचत समूहों की स्थापना की. इन बचत समूहों के माध्यम से नीलिमा मिश्रा ने ग़रीब और ज़रूरतमंद महिलाओं को विभिन्न कार्यों में लगाया. उन्होंने वर्ष 2000 में भागिनी निवेदिता ग्रामीण निकेतन की स्थापना की. नीलिमा मिश्रा को वर्ष 2013 में ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया जा चुका है.

सिंधुताई सपकल,
सिंधुताई एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो पुणे में वर्षों से अनाथ बच्चों को पाल रही हैं. सिंधुताई को लोग अनाथों की मां भी कहते हैं. सिंधुताई 1050 से अधिक अनाथ बच्चों को पाल चुकी हैं. अनाथ बच्चों से बने उनके इस परिवार में 207 दामाद, 36 बहुएं और 1000 से अधिक नाती-पोते शामिल हैं. सैकड़ों सरकारी और गैर सरकारी पुरस्कारों से सम्मानित सिंधुताई अभी अपनी कोशिश को जारी रखे हुए है.

इला भट्ट,
गांधीवादी कार्यकर्ता इला भट्ट ने 1972 में सेल्फ-इंप्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (SEWA) की शुरुआत की. वकालत की पढ़ाई कर चुकी इला ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम, सहकारिता और महिलाओं से जुड़े कई आंदोलन चलाएं. इला की संस्था SEWA छोटे ऋण देने, स्वास्थ्य और जीवन बीमा और बच्चों की देखभाल के कामों में लगी है. SEWA सौ से अधिक सहकारी समितियों की देखरेख में चलती है, जिन्हें महिलाएं संचालित करती हैं. 2010 के आंकड़ों के अनुसार SEWA के सदस्यों की संख्या 12 लाख से अधिक है.

नरौती देवी,
राजस्थान के किशनगढ़ जिले के एक गरीब दलित परिवार में जन्मी नरौती देवी, सारी बाधाओं को पार कर अपने हरमदा गांव की सरपंच बनीं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि नरौती कभी पत्थर काटने वाली मज़दूर के रूप में काम करती थीं. नरौती देवी मनरेगा के लिये संघर्ष में अग्रणी रहीं. वे सूचना का अधिकार, काम के अधिकार सहित कई आंदोलनों का प्रमुख चेहरा रही हैं. उन्होंने 1983 में न्यूनतम मजदूरी के लिये सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया था. इतना ही नहीं उन्होंने कम्प्यूटर चलाना सीखा और अब दूसरों को पढ़ाती हैं. नरौती की कोशिशों के चलते महिलाओं ने बैंक खाते खोले.

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