प्रेगनेंसी के आखिरी महीनों में दिन छोटे रहने पर हो सकता है अवसाद

वॉशिंगटन ; 

ऐसी महिलाएं जिनकी गर्भावस्था के आखिरी महीनों के दौरान दिन छोटे रहते हैं और उन्हें सूरज की रोशनी कम मिल पाती है, उन्हें प्रसव के बाद अवसाद पैदा होने का ज्यादा खतरा होता है. भारतीय मूल की एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में यह पाया गया है. यह अध्ययन ‘जर्नल ऑफ बिहेवियरल मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन सूरज की रोशनी और अवसाद के बीच संबंधों के बारे में पहले से मौजूद जानकारी के अनुरूप है. अमेरिका स्थित सान जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की दीपिका गोयल और उनके सहकर्मियों ने जो पता लगाया है, वह चिकित्सकों के लिए जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को विटामिन डी की मात्रा बढ़ाने की सलाह देने में मददगार हो सकता है.

अनुसंधानकर्ताओं ने अध्ययन में शामिल की गई 293 महिलाओं से मिली सूचना का विश्लेषण किया. अमेरिका के कैलिफोर्निया से अध्ययन में शामिल की गई ये सभी महिलाएं पहली बार मां बनी थीं. उनकी गर्भावस्था के आखिरी तीन महीनों के आंकड़ों को शामिल किया गया. इसमें महिलाओं की उम्र, उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति और वे कितने घंटे सोती हैं जैसे कारकों को शामिल किया गया.  अध्ययन में शामिल महिलाओं में अवसाद का 30 प्रतिशत जोखिम पाया गया.

कामकाज का बोझ ज्यादा होने के कारण अक्सर महिलाएं अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रख पाती है. आम दिनों में खाने पीने पर ध्यान ना देना तो फिर भी चल जाता है लेकिन गर्भावस्था के दौरान अगर आहार पर ध्यान ना दिया जाए तो इसका नुकसान मां और होने वाले बच्चों पर भी पड़ता है. ऐसी महिलाएं, जो गर्भावस्था के दौरान विटामिन-डी की कमी से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में जन्मजात और वयस्क होने पर मोटापा बढ़ने की अधिक संभावना रहती है. एक शोध में यह पता चला है. ऐसी मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चे, जिनमें विटामिन-डी का स्तर बहुत कम है, उनकी कमर चौड़ी होने या छह वर्ष की आयु में मोटा होने की संभावना अधिक होती है.

इन बच्चों में शुरुआती दौर में पर्याप्त विटामिन-डी लेने वाली मां के बच्चों की तुलना में 2% अधिक वसा होती है. अमेरिका में दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वइया लिदा चाटझी ने कहा, “ये बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं दिखती, लेकिन हम वयस्कों के बारे में बात नहीं कर रहे, जिनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा होती है.”

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