सम्मान वापसी या एक साजिश ?

स्नेहल पंचोली 

देश के बिगड़ते सांप्रदायिक माहौल और असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्यकारों का सम्मान लौटाना लगातार जारी है. वैसे तो साहित्य समाज का दर्पण होता है,साहित्य कालचक्र का साक्षी होता है. समाज में अच्छाइयों की रचना और बुराइयों की भर्त्सना करते हुए एक लोकतांत्रिक समाज को रचता है यही कारण है कि साहित्य अर्थात ‘सबका हित’ की परंपरा के निर्वहन करने वालों अर्थात साहित्यकारों को समाज बड़े सम्मान की दृष्टि से देखता है. वाल्मीकि,कालिदास मीरा,सूर,तुलसी,रहीम,रसखान की पावन परंपरा और बाबा कबीर के प्रतिरोधों के पद स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की भारतीय रिवायत है जिसे आमजनता आज भी सम्मान की दृष्टि से देखती है.  लेकिन वर्त्तमान स्थिति बिल्कुल इसके उलट दिखाई पड़ती है. सत्ता के विरुद्ध साहित्य के ज़रिये बिगुल फुकने की संस्कृति बेशक लोकतंत्र में सरकार को बेलगाम होने से रोकती है लेकिन बिलावज़ह विरोध करना देश की प्रगति में बाधक बनती है ऐसे में वे विसम्मति के झंडाबरदार नहीं बल्कि देश के लिए अहितकारी बन जाते हैं. सोशल मीडिया पर ऐसी चर्चाओं में दिनोंदिन वृद्धि होती जा रही है जिनमें साहित्यकारों, इतिहासकारों द्वारा लौटाए जा रहे सम्मान वापसी की आलोचनाएं होती हों. ऐसा नहीं कि आलोचनाएं ठाले बैठे फेसबुकिए कर रहें हो इन लोगों में कई नामचीन ​हस्तियों के साथ साहित्य जगत के हस्ताक्षर भी शामिल हैं. बॉलीवुड फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल, अभिनेत्री विद्या बालन, अनुपम खैर, ​प्रसिद्ध कवि गोपाल दास ‘​नीरज’, बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन जैसे लोग शामिल हैं. ‘मैं ये मानता हूं कि कोई भी राष्ट्रीय पुरस्कार कोई राजनीतिक दल नहीं देता बल्कि एक चयन प्रक्रिया के बाद देश अथवा संस्थान के द्वारा दिया जाता है, तो ऐसे में यह पुरस्कार लौटाना उचित नहीं है.’  ये बात वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कही. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लेखकों और कुछ प्रमुख व्यक्तियों को मिले पद्म एवं साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने के कारण इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया और इस बात पर आश्चर्य जताया कि वे तब क्या कर रहे थे, जब कांग्रेस के शासन में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे. बीते दिन से ही एक सिख युवक ने भी कांग्रेस के शासन काल में हुए सिख दंगों की याद दिलाते हुए साहित्य सम्मान और पद्म पुरस्कार लौटाने वालों से पूछा कि आप सब लोग उन दिनों कहां थे जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी का बयान आया था कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है. अब लगभग हर किसी की प्रोफाइल पिक्चर में उस जैसे स्लोगन अभियान की भांति चल पडे हैं. वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने तो साहित्य सम्मान वापस करने वालों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुरस्कार लौटाने की तात्कालिक उत्तेजना क्या थी यह समझ से परे है! ये जिस चिंतनधारा से निकले हुए लोग हैं उनका अपना इतिहास रहा है कि वे महात्मा गांधी को भी अंग्रेजों का एजेंट कहा करते थे. पुरस्कार लौटाने की तात्कालिक उत्तेजना के रूप में केवल और केवल 2014 के लोकसभा चुनाव में आया परिणाम दिखाई देता है. उनसे गांधी जैसा व्यक्ति तक विमर्श नहीं कर सका.’ पूर्ण बहुमत के साथ बनी यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार है. उस पर प्रधान सेवक के काम करने का तरीका ‘पेट में दर्द’ होना तो जायज है, और यही सम्मान वापसी का मुख्य कारण हो सकता है.

loading...