स्पाइना बिफिडा विकार के भारत में कई मामले, पोलियो जैसी अभियान की जरूरत

नई दिल्ली ; 

भारत में स्पाइना बिफिडा विकार का नाम शायद ही सुनने को मिलता हो, लेकिन इस विकार के मामले में भारत दुनिया के देशों से काफी आगे है. ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों में इसके प्रति जागरूकता की कमी है. ऐसा कहना है विशेषज्ञों का. विशेषज्ञों के अनुसार, स्पाइना बिफिडा एक जन्मजात विकार है, जो बच्चों में गर्भवती महिलाओं में फॉलिक एसिड की कमी के कारण होता है. इस विकार पर काबू पाने के लिए समाज के साथ ही सरकार को भी ध्यान देने की जरूरत है.

स्पाइना बिफिडा फाउंडेशन ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ एसबी (स्पाइना बिफिडा) ने जन्मजात समस्याओं की रोकथाम, जन्म से पूर्व एवं उसके बाद उपचार जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर शनिवार को यहां 28वां अंतर्राष्ट्रीय सलाना कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम का उद्धाटन मुख्य अतिथि मशहूर बॉलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन ने किया.

सम्मेलन में संस्था के संस्थापक, न्यासी डॉ. संतोष करमाकर, संस्था से संबद्ध चिकित्सक मार्गो व्हाइटफर्ड, भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के उपायुक्त डॉ. अजय खेड़ा, टाबायोटिक्स लिमिटेड-गो फॉलिक अभियान के निदेशक व उपाध्यक्ष रोहित शेलातकर के अलावा हार्वर्ड, सीडीसी (अटलांटा), विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत विश्व के कई देशों और भारत के विशेषज्ञ मौजूद थे.

तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग और देश की अग्रणी दवा कंपनी मायर वीटाबायोटिक्स की साझेदारी में किया गया.

इस मौके पर रवीना टंडन ने कहा, ‘मैं भारत में जन्मजात बीमारियों के बढ़ते प्रकोप को लेकर चिंतित हूं. यह जानना हम सभी के लिए बहुत दुखद है कि इस विकार से जुड़े मामले दुनिया में सबसे अधिक हमारे देश में देखने को मिलते हैं, जिसका सबसे बड़ा कारण जानकारी की कमी है. इस समस्या को दूर करने के लिए लोगों का जागरूक होना जरूरी है और मैं उम्मीद करती हूं इस कार्यक्रम के जरिए समाज में जागरूकता फैलेगी.’

गर्भवती महिला में अगर फॉलिक एसिड की कमी होती है तो बच्चा स्पाइना बिफिडा की विकृति के साथ जन्म लेता है. इसलिए महिलाओं को गर्भधारण करने से पहले से ही फॉलिक एसिड की गोली लेना शुरू कर देना चाहिए.

डॉ. संतोष करमाकर ने कहा, ‘भारत में न्यूरल ट्यूब की समस्या के निदान पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं को जल्द ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि पूरे विश्व के जिन देशों में सबसे अधिक जन्मजात बीमारियों होती हैं, उनमें भारत का नाम भी शामिल है. केंद्र और राज्य सरकारों को युद्धस्तर पर काम करने की जरूरत है, जैसा कि पोलियो अभियान के लिए किया गया था. हमारा संस्थान इस विकार से पीड़ित लोगों के पुनर्वास के लिए भी काम करता है जो इस जन्मजात समस्या के बावजूद अपने जीवन को सामान्य तरीके से जी सकें.’

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